प्रिय भारतवासियों,
हर रात हम टीवी खोलते हैं इस उम्मीद में कि देश के मुद्दों पर साफ और समझदार चर्चा सुनने को मिलेगी।
लेकिन हमें क्या मिलता है?
शोर।
चिल्लाहट।
तथ्यों से भागना।
व्यक्तिगत हमले।
कुछ प्रवक्ता ऐसे दिखाई देते हैं जिन्हें विषय की बुनियादी जानकारी तक नहीं होती। फिर भी वे पूरे आत्मविश्वास से गलत बातें दोहराते रहते हैं। सवाल पूछा जाता है कुछ और, जवाब मिलता है कुछ और।
क्या यही लोकतंत्र है?
क्या यही राजनीतिक समझदारी है?
सबसे “घटिया” प्रवक्ता वह है —
जिसे मुद्दे की समझ नहीं है
जो सवालों से बचने के लिए आवाज़ ऊँची करता है
जो दूसरों को बोलने नहीं देता
जिसे शिष्टाचार और सभ्यता की परवाह नहीं
जो पूरी बहस को पटरी से उतार देता है
टीवी डिबेट आज कई बार ज्ञान की जगह अखाड़ा बन चुकी है।
बहस कम, तमाशा ज्यादा।
तर्क कम, आरोप ज्यादा।
समाधान कम, शोर ज्यादा।
कुछ प्रवक्ता अपने दल का बचाव करने के नाम पर पूरी चर्चा को बिगाड़ देते हैं। वे तथ्यों की जगह भावना भड़काते हैं। वे मुद्दों की जगह व्यक्तिगत हमला करते हैं।
और सबसे दुखद बात?
हम दर्शक यह सब चुपचाप देखते रहते हैं।
भारत के नागरिकों, अब समय आ गया है कि हम तय करें —
क्या हमें पढ़े-लिखे, समझदार और शांत प्रतिनिधि चाहिए?
या फिर ऐसे लोग जो सिर्फ कैमरे के लिए चिल्लाते हैं?
लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, बदतमीज़ी से नहीं।
असहमति से देश आगे बढ़ता है, अराजकता से नहीं।
अब फैसला आपका है —
आप किसे सुनना चाहते हैं?
और किसे नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं?