प्रिय भारतवासियों, हर रात हम टीवी खोलते हैं इस उम्मीद में कि देश के मुद्दों पर साफ और समझदार चर्चा सुनने को मिलेगी। लेकिन हमें क्या मिलता है? शोर। चिल्लाहट। तथ्यों से भागना। व्यक्तिगत हमले। कुछ प्रवक्ता ऐसे दिखाई देते हैं जिन्हें विषय की बुनियादी जानकारी तक नहीं होती। फिर भी वे पूरे आत्मविश्वास से गलत बातें दोहराते रहते हैं। सवाल पूछा जाता है कुछ और, जवाब मिलता है कुछ और। क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही राजनीतिक समझदारी है? सबसे “घटिया” प्रवक्ता वह है — जिसे मुद्दे की समझ नहीं है जो सवालों से बचने के लिए आवाज़ ऊँची करता है जो दूसरों को...
भारत को ऐसे जनप्रतिनिधि चाहिए जो देश को पहले रखें — न कि अपनी कुर्सी, अपना फायदा और अपनी छवि। दुर्भाग्य से राजनीति में कभी-कभी ऐसे चेहरे भी दिखाई देते हैं जिनके शब्दों में जिम्मेदारी कम और अहंकार ज्यादा होता है। जिनकी प्राथमिकता जनता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ होती है। जिन्हें मुद्दों से ज्यादा मंच और माइक्रोफोन की चिंता होती है। देश को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं जो बहस को भटकाएँ, जो सवालों से बचें, जो शोर को तर्क से ऊपर रखें। राजनीति सेवा का माध्यम है, व्यक्तिगत प्रचार का नहीं। भारत की लोकतांत्रिक ताकत तभी मजबूत होगी जब हम ऐसे प्रतिनिधियों को चुनेंगे...