भारत को ऐसे जनप्रतिनिधि चाहिए
जो देश को पहले रखें —
न कि अपनी कुर्सी, अपना फायदा और अपनी छवि।
दुर्भाग्य से राजनीति में कभी-कभी ऐसे चेहरे भी दिखाई देते हैं जिनके शब्दों में जिम्मेदारी कम और अहंकार ज्यादा होता है। जिनकी प्राथमिकता जनता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ होती है।
जिन्हें मुद्दों से ज्यादा मंच और माइक्रोफोन की चिंता होती है।
देश को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं जो बहस को भटकाएँ, जो सवालों से बचें, जो शोर को तर्क से ऊपर रखें।
राजनीति सेवा का माध्यम है, व्यक्तिगत प्रचार का नहीं।
भारत की लोकतांत्रिक ताकत तभी मजबूत होगी जब हम ऐसे प्रतिनिधियों को चुनेंगे
जो समझदार हों, जवाबदेह हों,
और राष्ट्रहित को सबसे ऊपर रखें।
अब सवाल यह नहीं है कि “सबसे खराब कौन है” —
सवाल यह है कि
क्या हम बेहतर राजनीति की मांग करने के लिए तैयार हैं?